भगिनी निवेदिता का संक्षिप्त जीवन परिचय

सिस्टर निवेदिता

(1867 – 1911)

सिस्टर निवेदिता(मार्गेट एलिज़ाबेथ नोबेल), का जन्म 28 अक्टूबर 1867 को एक स्कॉट इरिश परिवार में हुआ। उन्होंने अपना पूरा जीवन आयरलैंड में व्यतीत किया। मानवजाति की सेवा की ईश्वर की सच्ची सेवा है ये उन्होंने अपने पिता से ही सीखा।

प्रारम्भिक जीवन

मार्गेट ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लंदन के एक बोर्डिंग स्कूल से प्राप्त की। उसके बाद अपनी बहन के साथ वो हालीफैक्स कॉलेज गईं जहां उन्होंने भौतिक विज्ञान, कला, संगीत और साहित्य जैसे विषयों की पढ़ाई की। महज़ सत्तरह साल की उम्र में केस्विक में उन्होंने अध्यापन शुरू किया। इसी क्रम में उन्होंने विम्बल्डन में अपना एक स्कूल स्थापित किया जिसमें निवेदिता के अध्यापन की बेजोड़ पद्धति के अनुसार पढ़ाई शुरू हुई। धार्मिक स्वभाव के कारण उन्होंने चर्च की गतिविधियों में भी भाग लिया। एक अच्छी लेखिका होने के नाते उन्होंने अखबारों और आवर्तियों में लेखन भी शुरु किया जिसके परिणाम स्वरूप जल्द ही उनका नाम लंदन के बौद्धिक वर्गों में शुमार हो गया।

स्वामी विवेकानंद से भेंट

नवंबर 1895 में, अमेरिका से लौटते हुए तीन महीने के लिए लंदन पहुंचे स्वामी विवेकानंद से उनकी मुलाकात हुई। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के कई व्याख्यानों में भाग लिया और पारस्पारिक वार्तालाप में उन्होंने अपनी शंका के कई प्रश्न स्वामी विवेकानंद से पूछे। स्वामी जी के उत्तरों ने ना केवल सिस्टर निवेदिता की शंकाएं दूर की बल्कि उनकी शिक्षाओं में गहरा विश्वास जगाया और स्वामी जी के प्रति उनके मन में आदरभाव उत्पन्न हुआ। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान भारतवासियों की दुर्दशा का वर्णन करते हुए स्वामी विवेकानंद ने महसूस किया कि शिक्षा के द्वारा ही भारतीय समाज की सभी कुरीतियों को दूर किया जा सकता है एवं भारतीय महिलाओं की स्थिति को सुधारा जा सकता है। इसलिए उन्होंने मार्गेट को भारतीय महिलाओं को शिक्षित करने का जिम्मा सौंपा।

भारत की ओर यात्रा

स्वामी विवेकानंद के आवाह्न पर मार्गेट ने भारत आने का निर्णय लिया और 28 जनवरी, 1898 को वो कोलकाता पहुंच गईं।

स्वामी विवेकानंद ने शुरुआती कुछ दिनों में मार्गेट को भारतीय इतिहास, दर्शनशास्त्र, साहित्य, आम जन जीवन, सामाजित रीतियों और महान व्यक्तिवों के बारे में बताया। प्राचीन और आधुनिक विकासशील भारत के प्रति उन्होंने मार्गेट में मन में प्रेम भी जगाया।

11 मार्च, 1898 को स्वामी विवेकानंद ने एक सार्वजनिक अधिवेशन का आयोजन किया जिसमें मार्गेट को कोलकाता के समृद्ध वर्ग से परिचित कराया गया। इस सभा में मार्गेट ने भारत और भारतवासियों की सेवा की इच्छा प्रगट की। भारत आने के कुछ ही दिनों पश्चात 17 मार्च 1898 को मार्गेट की भेंट रामकृष्ण की धर्मपत्नी और धार्मिक प्रवक्त शारदा देवी से हुई। शारदा देवी ने उन्हें बंगाल की कूकी अर्थात छोटी लड़की कहकर बुलाया। 1911 में शारदा देवी की मृत्यु तक निवेदिता उनकी विशिष्ट करीबियों में से एक रहीं।

25 मार्च 1898 को स्वामी विवेकानंद ने सार्वजनिक तौर पर उन्हें निवेदिता का नाम दिया। वो भारतीय मठ परम्परा को स्वीकारने वाली प्रथम पश्चिमी महिला बनीं।

बागबज़ार में बालिका विद्यालय

सिस्टर निवेदिता मौलिक शिक्षा से वंचित बालिकाओं के लिए एक विद्यालय खोलने के लिए उत्सुक थीं। वो इंग्लैंड और अमेरिका गईं और भारत पर कई व्याख्यान किए और इस तरह उन्होंने बालिका विद्यालय के लिए कोष जुटाया। 13 नवंबर,1898 को कालीपूजा के दिन कोलकाता के बागबाजार में उन्होंने स्कूल का शुभारंभ किया। स्कूल का उद्घाटन शारदा देवी द्वारा कराया गया।.

शिक्षा को प्रोत्साहन

सिस्टर निवेदिता बालिकाओं को शिक्षा देने के लिए एक घर से दूसरे घर तक गईं। जिनमें से कई लड़कियां अपनी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के कारण वश अत्यधिक दयनीय स्थिति में थीं। कई दशाओं में उन्हें लड़कियों के परिवार के पुरुष वर्ग के इन्कार का सामना भी करना पड़ा। निवेदिता के विद्यार्थियों में विधवाओं और वयस्क महिलाएं भी शामिल थीं। सिस्टर निवेदिता ने अत्यधिक रुढ़िवादी समाज में कार्य किया जिसमें अधिकांश माता-पिता अपनी बेटियों को शिक्षा देने के लिए सहमत नहीं थे। अपने छात्रों की संख्या बढ़ाने के लिए उन्हें एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे तक जाना पड़ता। वो अपने छात्रों को इतिहास, भूगोल, प्राकृतिक विज्ञान एवं कुछ अंग्रेजी विषयों का ज्ञान देतीं। वो उन्हें सिलाई-कढ़ाई, चित्रकारी एवं हस्तशिल्प भी सिखातीं। वो उन्हें शारीरिक व्यायाम करने हेतु प्रोत्साहित करती थीं। वो उनमें से कुछ शिक्षित महिलाओं को अच्छी अध्यापिका बनने हेतु विशिष्ट शिक्षा प्रदान करतीं।

सेवाएं

1899 में कोलकाता में आई प्लेग महामारी के दौरान सिस्टर निवेदिता ने कई रोगियों की देखभाल की, गंदे इलाकों को साफ किया एवं कई युवाओं को आगे आकर इस तरह की सेवा करने के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन दिया। उन्होंने अंग्रेजी अखबारों में अपने प्लेग रिलीफ गतिविधियों एवं प्लेग से छुटकारा पाने के लिए आर्थिक मदद की अपील की। वो दिन प्रतिदिन के कार्यों को संघटित करतीं, कार्यों का निरिक्षण करतीं और निजीतौर पर महामारी के रोकथाम के लिए हस्तलिखित हिदायद देतीं थीं।

मृत्यु

दार्जलिंग में महज़ 43 साल की उम्र में 13 अक्टूबर,1911 के ऊषाकाल में निवेदिता का देहान्त हुआ। दार्जिलिंग के विक्टोरिया फॉल्स के करीब रेलवे स्टेशन के रास्ते में उनका स्मारक स्थित है। 1968 में भारतीय सरकार ने उनकी याद में एक डाक टिकट भी जारी किया।.